| हे भलते अवघड असते |
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| गाडी सुटली, रुमाल हलले, क्षणात डोळे टचकन् ओले |
| गाडी सुटली, पडले चेहरे, क्षण साधाया हसरे झाले |
| गाडी सुटली, हातामधुनी हात कापरा तरी सुटेना |
| अंतरातली ओली माया तुटूदे म्हटले तरी तुटेना |
| का रे इतका लळा लावुनी नंतर मग ही गाडी सुटते |
| डोळ्यांदेखत सरकत जाते आठवणींचा ठिपका होते |
| गाडी गेली फलाटावरी नि:श्वासांचा कचरा झाला |
| गाडी गेली डोळ्यामधल्या निर्धाराचा पारा फुटला |
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| हे भलते अवघड असते... हे भलते अवघड असते... |
| कुणी प्रचंड आवडणारे... ते दूर दूर जाताना... |
| डोळ्यांच्या देखत आणि नाहीसे लांब होताना... |
| डोळ्यातील अडवून पाणी... हुंदका रोखुनी कंठी... |
| तुम्ही केविलवाणे हसता अन् तुम्हास नियती हसते... |
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| तरी असतो पकडायाचा... हातात रुमाल गुलाबी... |
| वार्यावर फडकवताना... पाह्यची चालती गाडी... |
| ती खिडकीतून बघणारी अन् स्वतः मधे रमलेली... |
| गजरा माळावा इतुके... ती सहज अलविदा म्हणते... |
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| तुम्ही म्हणता मनास आता, हा तोडायाचा सेतू... |
| इतक्यात म्हणे ती - माझ्या कधी गावा येशील का तू? |
| ती सहजच म्हणुनी जाते... मग सहजच हळवी होते... |
| गजर्यातील दोन कळ्या अन् हलकेच ओंजळीत देते... |
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| कळते की गेली वेळ... ना आता सुटणे गाठ... |
| आपुल्याच मनातील स्वप्ने... घेऊन मिटावी मूठ... |
| ही मूठ उघडण्यापूर्वी... चल निघुया पाऊल म्हणते... |
| पण पाऊल निघण्यापूर्वी... गाडीच अचानक निघते... |
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| परतीच्या वाटेवरती गुदमरून जड पायांनी... |
| ओठावर शीळ दिवाणी... बेफिकीर पण थरथरती... |
| पण क्षण क्षण वाढत असते... अंतर हे तुमच्यामधले... |
| मित्रांशी हसतानाही... हे दु:ख चरचरत असते... |
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| हे भलते अवघड असते…. |
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