मी फसलो म्हणूनी
Thursday, January 21, 2010
| मी फसलो म्हणूनी हसूदे वा चिडवूदे कोणी | ||||
| ती वेळच होती वेडी अन् नितांत लोभसवाणी | ||||
| ती उन्हे रेशमी होती, चांदणे धगीचे होते | ||||
| कवितेच्या शेतामधले ते दिवस सुगीचे होते | ||||
| संकेतस्थळांचे सूर त्या लालस ओठी होते | ||||
| ती वेळ पूरीया होती, अन् झाड मारवा होते | ||||
| आरोहा बिलगायाचा तो धीट खुळा अवरोह | ||||
| भरभरून यायचे तेंव्हा त्या दृष्ट नयनींचे डोह | ||||
| डोहात तळाशी खोल वर्तमान विरघळलेले | ||||
| अन् शब्दांच्या गाली पाणी थोडेसे ओघळलेले | ||||
| ती हार असो वा जीत, मज कुठले अप्रूप नाही | ||||
| त्या गंधित गोष्टीमधला क्षण कुठला विद्रूप नाही | ||||
| ती लालकेशरी संध्या निघताना अडखळलेली | ||||
| ती निघून जातानाही, बघ ओंजळ भरूनी ओली | ||||


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